Monday, 23 January 2023

शौक

शौक तो बचपन में पुरे किये अभी सिर्फ एडजस्टमेंट करता हूँ।
मैं जीने के लिए आज कल रोज तकलीफ सहन करता हूँ।

रोज काम पर इसलिए जाता हूँ के जिम्मेदारी पूरी कर सकूँ।
कभी समझ नहीं आया के जिंदगीको कैसे ख़ुश कर सकूँ।

सबको खुश करते करते खुद के आंसू छुपाता हूँ।
अपने आँसू छुपाने के लिए दूसरोंसे मज़ाक कर लेता हूँ।

कितने मज़ाकिया हो ये लोग मुझे कहते हैं।
उन्हें क्या पता कितने दुख ये दिल मैं छुपे हैं।

कुछ चीजें पाने के लिए बचपन मैं सिर्फ रोना पढ़ता था।
कमाकर भी खुद की चीजें खरीदनेके लिए रोना आता है।

कमाता हूँ किसके लिए ये जिंदगी कभी खुद के लिए जीने दे।
मुझे खुले आसमान के निचे बेवजाय थोड़ा घूमनेतो दे।

ये जिंदगी मुझे एक तो थोड़ा सुकून दे।
नहीं तो मेरा अगला पिछला हिसाब बना दे।

तंग आगया हूँ तेरे हर वक्त के इम्तिहानसे।
कटपुतली बंद गया हूँ मैं तेरे इशारोपे।


- यशवंत द. ओव्हाळ 
https://yashovhal23.blogspot.com

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